ऋषिकेश 06 फरवरी। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऋषिकेश के बापुग्राम, सुमन विहार, बीस बीघा, मीरा नगर, शिवाजी नगर, नन्दू फ़ार्म, गीता नगर, मालवीय नगर एवं अमित ग्राम क्षेत्र में वन विभाग द्वारा बताई जा रही वन भूमि के संबंध में दिए गए हालिया आदेश के पश्चात क्षेत्र से प्रभावित लोगों के एक समूह द्वारा आरटीआई से मांगी गई जानकारी के आधार पर
यह दावा किया गया है कि जिस भूमि को वन विभाग द्वारा वन क्षेत्र बताया जा रहा है उस भूमि के मीरा बेन और पशु लोक को लीज़ पर दिये जाने से संबंधित मूल दस्तावेज वन विभाग के अभिलेखों में उपलब्ध नहीं हैं। वन विभाग द्वारा इन अभिलेखों को लेकर कोई भी पुष्ट जानकारी नहीं दी गई है।
उपरोक्त क्षेत्र से प्रभावित लोगों के एक समूह द्वारा दावा किया कि इस आधार पर वन विभाग कैसे कह सकता है कि उपरोक्त जमीन वन विभाग क्षेत्र की जमीन है। यदि वन विभाग के पास खुद इसके पुष्ट अभिलेख नहीं है तो तो यह विभाग किस आधार पर सर्वोच्च न्यायालय में जमीन के स्वामित्व का दावा ठोक सकता है। यदि वन विभाग द्वारा इन अभिलेखों को लेकर कोई भी अभिलेख प्रस्तुत नहीं कर पा रही है तो इसका सीधा मतलब यह है कि यह जमीन सरकार के अधीन राजस्व भूमि हो जाती है। जिसके लिए सरकार को यह होना चाहिए कि उपरोक्त क्षेत्र के सभी पीड़ित हजारों परिवारों के भविष्य को देखते हुए नियमितीकरण कर इसे राजस्व ग्राम घोषित किया जाना चाहिए।
बताते चले उपरोक्त भूमि को लेकर हजारों परिवार में गहरी निराशा और असमंजस की स्थिति उत्पन्न होने के कारण
समस्या के तकनीकी एवं कानूनी समाधान की दिशा में पहल करते हुए लीगल सेव होम नामक समूह का गठन किया गया। जिसमें समूह के सदस्य चंद्र भूषण शर्मा द्वारा वन विभाग को सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत कुछ सूचनाये मांगी गई।
पत्रकार वार्ता में उन्होंने यह दावा किया गया कि सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना के जवाब में वन विभाग द्वारा यह जानकारी दी गई कि
यह भूमि मूल रूप से चारागाह की भूमि थी। ब्रिटिश काल में वर्ष 1895 एवं 12 दिसंबर 1910 में वीरभद्र ब्लॉक और लाल पानी ब्लॉक में बांटकर 7444 एकड़ जमीन आरक्षित वन क्षेत्र घोषित किया गया था,परंतु वर्ष 1927 में इस भूमि को वन भूमि की श्रेणी से बाहर कर दिया गया।
उन्होंने यह भी बताया कि वन विभाग द्वारा उपरोक्त भूमि को अपनी बताने का दावा करने पर सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत जब यह पूछा गया कि वन विभाग द्वारा बापू ग्राम को बसाने के लिए मीरा बेन और पशु लोक को कितने समय और किस आधार पर लीज दी गई थी। जिसके जवाब में वन विभाग द्वारा सूचना में बताया गया कि उनके द्वारा 1950 में 2866 एकड भूमि पशुलोक सेवा मण्डल को 99 वर्ष के लिए लीज़ पर दी गई। परंतु दी गई लीज़ से संबंधित मूल दस्तावेज वन विभाग के अभिलेखों में उपलब्ध नहीं हैं। जिसके आधार पर उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी है।
अतः जब यह भूमि 1927 में ही वन भूमि की श्रेणी से बाहर कर दी गई थी तो इस पर वन विभाग अपना अधिकार कैसे जता सकता है।
समूह संगठन के द्वारा यह दावा भी किया गया कि इस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय में वन विभाग ही यह सिद्ध करे कि संबंधित भूमि को कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत वास्तव में उपरोक्त भूमि उनके विभाग में सम्मिलित की गई था या नहीं।
अब देखने वाली बात यह है कि इसका जवाब वन विभाग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में किस तरह दिया जाएगा यह वक्त ही तय करेगा।
पत्रकार वार्ता में सुनील कुमार शर्मा, अर्पणा सिंह, शुभांकित भट्ट, अमित जुगलान ,पुनीत रावत, मधुर ज़ख्मोला, रोशन लाल, भानु दत्त ,सौरभ शर्मा, आरएस बिष्ट ,हरेंद्र रावत व देवांशु नेगी आदि मौजूद थे।














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