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उत्तराखंड में शिक्षा के मंदिर में ‘किताबों की लूट’! प्राइवेट स्कूलों की मनमानी से अभिभावकों की जेब पर डाका, 


ऋषिकेश 2 अप्रैल। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही शहर के कई प्राइवेट स्कूलों में किताबों और कॉपियों के नाम पर खुली लूट का आरोप सामने आने लगा है। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रबंधन द्वारा उन्हें तय दुकानों से ही किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जहां बाजार कीमत से कहीं अधिक दाम वसूले जा रहे हैं। जहां एनसीईआरटी की किताबों के लिए एक छात्र का बजट औसत ₹1500 से 2000 आता है तो वही अन्य प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबों का औसत 5000 से 10000 के बीच में आता है।

अमूमन यह देखा गया है कि प्राइवेट पब्लिकेशन की ओर से स्कूलों में विजिट कर स्कूल प्रबंधन शिक्षकों प्रिंसिपल आदि सभी से मोटी कमीशन तय कर हर साल किताबों को बदला जाता है। जबकि पहले मध्यम वर्गीय परिवारों में बच्चों के बड़ी क्लास में जाने पर एक बच्चे की किताबें दूसरे बच्चे के काम आ जाती थी। परंतु अब हर साल किताब बदलने से और प्राइवेट पब्लिकेशन किताबों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि का सीधा-सीधा असर हर साल मध्यम वर्गीय अभिभावकों की जेब पर डाका डलता नजर आता है। 

अभिभावकों के अनुसार कई स्कूलों ने अपनी किताबों की सूची के साथ विशेष बुक सेलर तय कर रखे हैं और स्पष्ट रूप से कहा जाता है कि किताबें केवल वहीं से खरीदी जाएं। जिसके लिए नगर की प्रमुख किताबों की दुकानों पर वही किताबें बिक्री हेतु रखी जाती है। अन्य दुकानों से किताबें खरीदने पर बच्चों को कक्षा में परेशानी होने या किताबें बदलने की बात कहकर दबाव बनाया जाता है। इससे अभिभावक मजबूरी में महंगे दामों पर किताबें खरीदने को विवश हैं।

कई अभिभावकों का आरोप है कि किताबों के साथ अनावश्यक कॉपियां, एक्टिविटी बुक, प्रोजेक्ट फाइल और अन्य सामग्री भी पैकेज के रूप में थमा दी जाती है, जिससे एक छात्र की किताबों का खर्च 5 से 10 हजार रुपये तक पहुंच रहा है। पहले से ही भारी-भरकम फीस भर रहे अभिभावकों के लिए यह अतिरिक्त बोझ किसी आर्थिक संकट से कम नहीं है।
अभिभावकों ने शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन से इस मामले में हस्तक्षेप कर जांच कराने और प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि शिक्षा का व्यवसायीकरण कर अभिभावकों का शोषण किया जा रहा है, जिस पर जल्द सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।


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