ऋषिकेश 5 जनवरी। ऋषिकेश में वन विभाग द्वारा रिहायशी इलाकों में खाली पड़ी वन भूमि के सर्वे के दौरान हुए तनाव के चलते ऋषिकेश वाशियो की नजर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हुई थी।
जिसको देखते हुए सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने अगले आदेश तक यथा स्थिति बरकरार रखने के आदेश दे दिए है। साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को 2 हफ्ते का समय दिया है और एक विस्तृत हलफनामा मांगा गया है।
5 जनवरी, 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऋषिकेश वन भूमि पट्टे मामले की सुनवाई जारी रखते हुए उत्तराखंड सरकार से वन भूमि पर किए गए अवैध निर्माणों का विस्तृत विवरण देते हुए एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा।इससे पहले न्यायालय ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य अधिकारियों की “लगातार लापरवाही” की आलोचना की थी।
5 जनवरी, 2026 को जारी किए गए प्रमुख आदेश और निर्देश
अनुपालन रिपोर्ट समीक्षा: इस मामले को राज्य अधिकारियों द्वारा दिसंबर 2025 में जारी प्रारंभिक आदेशों के बाद से उठाए गए उपायों पर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए सूचीबद्ध किया गया था।
विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने राज्य सरकार को विवादित 2,866 एकड़ आरक्षित वन भूमि पर बने सभी अवैध निर्माणों के स्थल मानचित्र और अनुमानित विवरण सहित एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
अधिकारियों की आलोचना: अदालत ने राज्य के अधिकारियों की कड़ी आलोचना दोहराते हुए कहा कि सार्वजनिक वन भूमि पर व्यवस्थित रूप से कब्जा किए जाने के दौरान वे “मूक दर्शक” की तरह काम कर रहे थे, जिससे भूमि हड़पने वालों के साथ संभावित “मिलीभगत और सांठगांठ” का संकेत मिलता है।
पूर्व आदेशों की स्थिति: दिसंबर 2025 के अंतरिम आदेश अभी भी प्रभावी हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
विवादित भूमि पर सभी निर्माण गतिविधियों पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाए।
भूमि संबंधी लेन-देन पर रोक लगाना, निजी व्यक्तियों को भूमि बेचने या तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने से प्रतिबंधित करना।
वन विभाग और संबंधित संग्राहकों को निर्देश दिया जाता है कि वे सभी खाली जमीनों (मौजूदा आवासीय मकानों को छोड़कर) पर कब्जा कर लें।
पृष्ठभूमि
यह मामला वन भूमि पर कथित बड़े पैमाने पर अतिक्रमण से संबंधित एक याचिका से उत्पन्न हुआ था, जिसे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एक मामले में बदल दिया। दिसंबर 2025 में जारी प्रारंभिक आदेशों के बाद वन विभाग द्वारा सर्वेक्षण किए गए, जिनका ऋषिकेश के कुछ स्थानीय निवासियों ने हिंसक विरोध किया। उनका दावा था कि जांच से उनकी आजीविका खतरे में है और सामुदायिक चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।
उच्चतम न्यायालय में क्या-क्या कार्रवाई हुई, इसकी विस्तृत जानकारी निम्न प्रकार है।
कोर्ट के बिंदुवार विवरण इस प्रकार है।
1. जज साहब का अधिकारियों पर गुस्सा मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने सुनवाई शुरू होते ही सरकारी वकील और वन विभाग से बहुत तीखे सवाल पूछे। उन्होंने साफ कहा:
“हम हैरान हैं! राज्य सरकार की मशीनरी पूरी तरह फेल हो चुकी है। यह अधिकारियों की लापरवाही नहीं, बल्कि उनकी ‘मिलीभगत’ लगती है।”
2. सबसे बड़ा सवाल: “23 साल तक कहाँ थे?”
जज साहब ने सरकारी वकील को फटकारते हुए कहा:
“2000 से लेकर 2023 तक (23 साल) आप कहाँ सो रहे थे? आपने लोगों को वहां घर बनाने दिया, उनकी पीढ़ियों को वहां बसने दिया… और अब अचानक आप कोर्ट के आदेश की आड़ लेकर उन्हें बेघर करना चाहते हैं?”
3. सरकार की दलील और कोर्ट का जवाब:
सरकारी वकील ने कहा: “हुजूर, हमने अतिक्रमण हटाने की कोशिश की थी, लेकिन वहां हिंसा हो गई थी, हम बाकी पॉकेट्स (हिस्सों) में भी कार्रवाई जारी रखना चाहते हैं।”
इस पर जज साहब ने उन्हें चुप करा दिया और कहा:
“आज हम आपको कोई ‘पवित्र गाय’ नहीं मानेंगे। हम पहले आपका पुराना आचरण देखेंगे। आप अपनी मनमानी नहीं कर सकते।”
आदेश
कोर्ट ने साफ़ शब्दों में कहा:
स्टे बरकरार है:
यथास्थिति जैसा है, वैसा ही रहेगा।
5. 2 हफ्ते का समय
कोर्ट ने राज्य सरकार को 2 हफ्ते का समय दिया है और एक विस्तृत हलफनामा मांगा है। कोर्ट ने पूछा है:
कुल कितनी जमीन है?
कितने लोग वहां रह रहे हैं?
किस तरह के निर्माण हुए हैं (कच्चे/पक्के)?
साइट प्लान क्या है?
साइट प्लान क्या है?
समय सीमा में वन भूमि की विस्तृत जानकारी और भूमि पर बसे लोगों की संख्या बताने को कहा।
भूमि पर किस तरह के निर्माण हुए हैं उनका डाटा भी उपलब्ध कराने को कहा।
खाली भूमि के सर्वे की रिपोर्ट सौंपने के दौरान बेंच ने सरकारी वकील को लगाई कड़ी फटकार।
सरकारी वकील ने कहा अतिक्रमण हटाने का किया प्रयास, लेकिन हिंसा होने से आई बाधा।
बेंच ने पूछा 23 वर्ष तक कहां थे सोये।
अब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की आड़ पर कर रहे बेघर।
सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी।
राज्य सरकार की मशीनरी पूरी तरह फेल।
अधिकारियों की लापरवाही और मिलीभगत का है परिणाम।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश वन भूमि पर यथास्थिति बनाए रखें सरकार।
सर्वोच्च न्यायालय में अब दो हफ्तों के बाद होगी मामले की अगली सुनवाई।













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