देहरादून 07 सितंबर । हिमालय दिवस के अवसर पर वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आयोजित ‘हिमालयो नाम नगाधिराजः’ कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हिमालय संरक्षण और सतत विकास पर जोर दिया। उन्होंने घोषणा की कि हिमालय के संरक्षण, संवर्धन एवं सतत विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और हिमालयी क्षेत्रों के लिए समर्पित विशिष्ट व्यक्तित्वों को हर वर्ष ‘हिमालय विभूति सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने हिमालय परिषद में मूलभूत सुविधाओं एवं संसाधनों में वृद्धि के लिए एक करोड़ रुपये की धनराशि देने की भी घोषणा की।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालय केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान, संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। गंगा-यमुना सहित अनेक जीवनदायिनी नदियों का उद्गम हिमालय से होता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों, पारंपरिक जल स्रोतों और हिमालयी पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है। अतिवृष्टि, भूस्खलन, वनाग्नि और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएं नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं।
धामी ने कहा कि उत्तराखंड के विकास का रास्ता इकोलॉजी और इकोनॉमी के संतुलन से होकर निकलेगा। पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाओं का विस्तार जरूरी है, लेकिन विकास राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों और धारण क्षमता को ध्यान में रखकर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा विकास जरूरी है जिसमें सड़कें भी बनें और जंगल भी सुरक्षित रहें, रोजगार बढ़े और नदियां भी निर्मल रहें तथा पर्यटन के साथ पर्यावरण का संतुलन बना रहे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालय संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियां हमसे केवल बड़ी इमारतों और चौड़ी सड़कों का हिसाब नहीं मांगेंगी, बल्कि स्वच्छ हवा, पानी, नदियों और जंगलों का भी हिसाब लेंगी। इसलिए आज से ही प्रकृति संरक्षण को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मिशन लाइफ’ का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं है। पानी-बिजली की बचत, प्लास्टिक का कम उपयोग, स्वच्छता, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार जैसे प्रयास सामूहिक रूप से बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘नमामि गंगे’, ‘नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग द हिमालयन इकोसिस्टम’ और ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ जैसे प्रयासों से हिमालयी क्षेत्रों के संरक्षण और सतत विकास को गति मिल रही है। राज्य सरकार उत्तराखंड को हिमालय संरक्षण की दिशा में मॉडल राज्य बनाने के संकल्प के साथ काम कर रही है।
उन्होंने कहा कि हिमालय संरक्षण को पहाड़ की समृद्धि से जोड़ना होगा। स्थानीय उत्पादों को बाजार, गांवों में रोजगार, मातृशक्ति का आर्थिक सशक्तिकरण, प्राकृतिक खेती और पर्यावरण अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देकर पलायन को कम किया जा सकता है। जंगल, बुग्याल, जैव विविधता, नदियां और पारंपरिक ज्ञान हमारी इकोलॉजिकल वेल्थ हैं, जो भविष्य में इकोनॉमिक स्ट्रेंथ भी बन सकते हैं।
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित पांच पोस्टरों का विमोचन किया। इनमें 7वें देहरादून इंटरनेशनल साइंस एंड टेक्नोलॉजी फेस्टिवल, साइंस एंड टेक्नोलॉजी प्रीमियर लीग, सीमांत बाल विज्ञान कांग्रेस, ज्ञानोत्कर्ष और 21वीं उत्तराखंड राज्य साइंस कॉन्फ्रेंस के पोस्टर शामिल रहे। उन्होंने विज्ञान के लोकप्रियकरण पर केंद्रित पत्रिका ‘विज्ञान संप्रेषण’ के पांचवें वार्षिकांक का भी विमोचन किया।
इस अवसर पर विधायक किशोर उपाध्याय, हेस्को के संस्थापक एवं पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. तृप्ता ठाकुर, यू-कॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत, रजिस्ट्रार डॉ. राजेश उपाध्याय, संयुक्त निदेशक डीपी उनियाल सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।
हिमालय संरक्षण के साथ विकास का संतुलन जरूरी: पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री ने की ‘हिमालय विभूति सम्मान’ शुरू करने की घोषणा, हिमालय परिषद के लिए ₹1 करोड़ देने का ऐलान














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